परीक्षा में बैठने वाले छात्र स्वयं कई तरह के दबाव से गुजर रहे होते हैं। ऐसे में परीक्षा के दो हफ्ते पहले अभिभावक उनकी पढ़ाई की प्रक्रिया में अधिक हस्तक्षेप न करें। छात्रों की परीक्षा अभिभावकों की सामाजिक प्रतिष्ठा का अखाड़ा नहीं है और न तो बच्चों की मार्कशीट, सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु है। जब परीक्षा नजदीक है, तो माता-पिता को यह देखना चाहिए कि कहीं वह अपनी महत्त्वाकांक्षा के बहाने, बच्चों पर अनावश्यक दबाव तो नहीं बना रहे हैं?
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. यतनपाल सिंह बल्हारा कहते हैं कि ‘परीक्षा नजदीक आ चुकी है, तो अभिभावकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों का आत्मविश्वास बना रहे और उनकी नींद पूरी हो। छात्रों को ताजा फल-सब्जी और स्वास्थवर्धक भोजन लेना चाहिए और नियमित रूप से थोड़ा व्यायाम करना चाहिए, जिससे तनाव कम रहेगा। इस दौरान छात्रों को अनावश्यक इंटरनेट सर्फिंग और अत्यधिक वीडियो गेम से बचना चाहिए।’ वीडियो-गेम पर अत्यधिक समय देने से बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है और उनके लिए एकाग्रचित्त होकर कुछ पढ़ना मुश्किल कार्य हो सकता है।
अभिभावकों को यह याद रखना होगा कि सीखना, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक-छात्र, स्कूल-समाज, पाठ्यक्रम, रुचि-जरूरत जैसे अनेक कारक भगीदारी करते हैं। यह अलग बात है कि बोर्ड परीक्षा के जरिए सीखने का मूल्यांकन करने में विफलता का दोष अकेले छात्र के ऊपर आ जाता है और शिक्षा में व्याप्त असमानता, बहस से ओझल हो जाती है। अभिभावक अपने छात्र जीवन के अनुभव से बता सकते हैं कि उनकी कक्षा के मेधावी छात्र अब क्या करते हैं। यह भी संभव है कि कल का वह मेधावी छात्र, आज नौकरी छोड़ कर समाजसेवा या खेती कर रहा हो!
जो अभिभावक अपने बच्चों के कम अंक आने की आशंका से ग्रसित हैं, क्या वे यह नहीं जानते कि जीवन में सफलता कोई स्थायी भाव लेकर नहीं आती है! जीवन की हर विधा में कोई अव्वल नहीं रह सकता है। समाज का सफल से सफल व्यक्ति भी विफलता की राह से गुजरा हुआ होता है। अव्वल बने रहने की होड़, जीवन में हर समय किसी को ‘सबसे आगे’ नहीं रखेगी और तब क्या पराजयबोध का सामना करना आसान होगा? क्या स्कूली परीक्षा के प्राप्तांक, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की गारंटी देते हैं? आप दुनिया में प्रसिद्ध व्यक्तियों की सूची उठा लीजिए और देखिए, कितने लोगों ने स्कूलों में अधिक नंबर पाने के कारण समाज में, व्यापार में, खेल में, फिल्म-साहित्य में अपनी जगह बनाई है! नवाचार और नाम कमाने वाले लोगों से कौन उनकी मार्कशीट मांगता है?
बुनियादी रूप से, प्रत्येक छात्र दूसरों से अलग होता है। परीक्षा के अंकों की तुलना छात्रों में एक प्रकार की कुंठा को जन्म देती है, जबकि स्कूलों से यह अपेक्षा रहती है कि वह छात्रों में हौसला, हिम्मत और हुनर पैदा करेगा! अगर कोई छात्र, परीक्षा परिणाम की आशंका से अपना आत्मविश्वास खोता है, तो स्कूल की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वभाविक है? अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को अंकों की मैराथन के बजाय वास्तविक मैराथन के लिए तैयार करें।
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परीक्षा में बैठने वाले छात्र स्वयं कई तरह के दबाव से गुजर रहे होते हैं। ऐसे में परीक्षा के दो हफ्ते पहले अभिभावक उनकी पढ़ाई की प्रक्रिया में अधिक हस्तक्षेप न करें। छात्रों की परीक्षा अभिभावकों की सामाजिक प्रतिष्ठा का अखाड़ा नहीं है और न तो बच्चों की मार्कशीट, सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु है। जब परीक्षा नजदीक है, तो माता-पिता को यह देखना चाहिए कि कहीं वह अपनी महत्त्वाकांक्षा के बहाने, बच्चों पर अनावश्यक दबाव तो नहीं बना रहे हैं?
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. यतनपाल सिंह बल्हारा कहते हैं कि ‘परीक्षा नजदीक आ चुकी है, तो अभिभावकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों का आत्मविश्वास बना रहे और उनकी नींद पूरी हो। छात्रों को ताजा फल-सब्जी और स्वास्थवर्धक भोजन लेना चाहिए और नियमित रूप से थोड़ा व्यायाम करना चाहिए, जिससे तनाव कम रहेगा। इस दौरान छात्रों को अनावश्यक इंटरनेट सर्फिंग और अत्यधिक वीडियो गेम से बचना चाहिए।’ वीडियो-गेम पर अत्यधिक समय देने से बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है और उनके लिए एकाग्रचित्त होकर कुछ पढ़ना मुश्किल कार्य हो सकता है।
अभिभावकों को यह याद रखना होगा कि सीखना, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक-छात्र, स्कूल-समाज, पाठ्यक्रम, रुचि-जरूरत जैसे अनेक कारक भगीदारी करते हैं। यह अलग बात है कि बोर्ड परीक्षा के जरिए सीखने का मूल्यांकन करने में विफलता का दोष अकेले छात्र के ऊपर आ जाता है और शिक्षा में व्याप्त असमानता, बहस से ओझल हो जाती है। अभिभावक अपने छात्र जीवन के अनुभव से बता सकते हैं कि उनकी कक्षा के मेधावी छात्र अब क्या करते हैं। यह भी संभव है कि कल का वह मेधावी छात्र, आज नौकरी छोड़ कर समाजसेवा या खेती कर रहा हो!
जो अभिभावक अपने बच्चों के कम अंक आने की आशंका से ग्रसित हैं, क्या वे यह नहीं जानते कि जीवन में सफलता कोई स्थायी भाव लेकर नहीं आती है! जीवन की हर विधा में कोई अव्वल नहीं रह सकता है। समाज का सफल से सफल व्यक्ति भी विफलता की राह से गुजरा हुआ होता है। अव्वल बने रहने की होड़, जीवन में हर समय किसी को ‘सबसे आगे’ नहीं रखेगी और तब क्या पराजयबोध का सामना करना आसान होगा? क्या स्कूली परीक्षा के प्राप्तांक, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की गारंटी देते हैं? आप दुनिया में प्रसिद्ध व्यक्तियों की सूची उठा लीजिए और देखिए, कितने लोगों ने स्कूलों में अधिक नंबर पाने के कारण समाज में, व्यापार में, खेल में, फिल्म-साहित्य में अपनी जगह बनाई है! नवाचार और नाम कमाने वाले लोगों से कौन उनकी मार्कशीट मांगता है?
बुनियादी रूप से, प्रत्येक छात्र दूसरों से अलग होता है। परीक्षा के अंकों की तुलना छात्रों में एक प्रकार की कुंठा को जन्म देती है, जबकि स्कूलों से यह अपेक्षा रहती है कि वह छात्रों में हौसला, हिम्मत और हुनर पैदा करेगा! अगर कोई छात्र, परीक्षा परिणाम की आशंका से अपना आत्मविश्वास खोता है, तो स्कूल की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वभाविक है? अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को अंकों की मैराथन के बजाय वास्तविक मैराथन के लिए तैयार करें।
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