दुनिया भर में विद्यार्थियों के मूल्यांकन को लेकर माथापच्ची होती रही है। इस पर लंबे समय से विचार किया जाता रहा है कि परीक्षा की क्या पद्धति अपनाई जाए, जिससे विद्यार्थियों में मानसिक तनाव भी न पैदा हो और उनमें पाठ्यक्रम को सीखने की ललक भी बनी रहे। कई विशेषज्ञ परीक्षा पद्धति का ही विरोध करते रहे हैं। इन तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा बोर्ड परीक्षा के तरीकों पर विचार करते रहे हैं।
आने वाले वर्षों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों में होने वाली प्रवेश परीक्षा में अन्य सरकारी-निजी विश्वविद्यालयों के शामिल होने की संभावना है। ऐसे में क्या देश में स्कूली परीक्षा के लिए बने बोर्ड की सचमुच जरूरत रह जाएगी? बोर्ड परीक्षा कराने में जो संसाधन लगते हैं, उनका उपयोग स्कूल स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति और कक्षा के ढांचे को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। छात्रों का मूल्यांकन करने के लिए स्कूल को ही स्वायत्तता दे दी जाए! जो छात्र देश से बाहर जाना चाहते हैं, उनके सर्टिफिकेशन के लिए आइएलटीएस जैसी एक अलग पात्रता परीक्षा रखी जा सकती है।
परीक्षा पद्धति में बदलाव के लिए लगातार प्रयास होने चाहिए। 1993 में प्रोफेसर यशपाल की अगुआई वाली समिति ‘शिक्षा बिना बोझ के’ ने भी स्कूली शिक्षा की परीक्षा पद्धति को बदलने की बात कही थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी बोर्ड परीक्षा के वर्तमान स्वरूप को बदलने की अनुशंसा करती है। शिक्षा अधिकार कानून-2009 में सतत शिक्षण मूल्यांकन का प्रावधान था।
हालांकि यह कानून सिर्फ कक्षा आठवीं तक के लिए बना, लेकिन इसमें शिक्षकों को नियमित रूप से यह पता चलता था कि उनकी कक्षा के किस छात्र को कौन-सी अवधारणा सीखने में कठिनाई है और शिक्षक उस छात्र की समय रहते मदद कर सकते थे। लेकिन शिक्षकों के एक वर्ग के विरोध के चलते सतत शिक्षण मूल्यांकन को हटा दिया गया। एशिया-अफ्रीका के देशों में शिक्षा-व्यवस्था में मैनेजमेंट सिद्धांतों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और सीखने की प्रक्रिया, शिक्षकों की भर्ती से अधिक जोर परीक्षा/ मूल्यांकन पर दिया जा रहा है। तार्किक चिंतन की जगह बहुविकल्पीय प्रश्नों का जोर देखा जा रहा है।
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दुनिया भर में विद्यार्थियों के मूल्यांकन को लेकर माथापच्ची होती रही है। इस पर लंबे समय से विचार किया जाता रहा है कि परीक्षा की क्या पद्धति अपनाई जाए, जिससे विद्यार्थियों में मानसिक तनाव भी न पैदा हो और उनमें पाठ्यक्रम को सीखने की ललक भी बनी रहे। कई विशेषज्ञ परीक्षा पद्धति का ही विरोध करते रहे हैं। इन तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा बोर्ड परीक्षा के तरीकों पर विचार करते रहे हैं।
आने वाले वर्षों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों में होने वाली प्रवेश परीक्षा में अन्य सरकारी-निजी विश्वविद्यालयों के शामिल होने की संभावना है। ऐसे में क्या देश में स्कूली परीक्षा के लिए बने बोर्ड की सचमुच जरूरत रह जाएगी? बोर्ड परीक्षा कराने में जो संसाधन लगते हैं, उनका उपयोग स्कूल स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति और कक्षा के ढांचे को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। छात्रों का मूल्यांकन करने के लिए स्कूल को ही स्वायत्तता दे दी जाए! जो छात्र देश से बाहर जाना चाहते हैं, उनके सर्टिफिकेशन के लिए आइएलटीएस जैसी एक अलग पात्रता परीक्षा रखी जा सकती है।
परीक्षा पद्धति में बदलाव के लिए लगातार प्रयास होने चाहिए। 1993 में प्रोफेसर यशपाल की अगुआई वाली समिति ‘शिक्षा बिना बोझ के’ ने भी स्कूली शिक्षा की परीक्षा पद्धति को बदलने की बात कही थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी बोर्ड परीक्षा के वर्तमान स्वरूप को बदलने की अनुशंसा करती है। शिक्षा अधिकार कानून-2009 में सतत शिक्षण मूल्यांकन का प्रावधान था।
हालांकि यह कानून सिर्फ कक्षा आठवीं तक के लिए बना, लेकिन इसमें शिक्षकों को नियमित रूप से यह पता चलता था कि उनकी कक्षा के किस छात्र को कौन-सी अवधारणा सीखने में कठिनाई है और शिक्षक उस छात्र की समय रहते मदद कर सकते थे। लेकिन शिक्षकों के एक वर्ग के विरोध के चलते सतत शिक्षण मूल्यांकन को हटा दिया गया। एशिया-अफ्रीका के देशों में शिक्षा-व्यवस्था में मैनेजमेंट सिद्धांतों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और सीखने की प्रक्रिया, शिक्षकों की भर्ती से अधिक जोर परीक्षा/ मूल्यांकन पर दिया जा रहा है। तार्किक चिंतन की जगह बहुविकल्पीय प्रश्नों का जोर देखा जा रहा है।
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